इस आर्टिकल में
- क्लाइंट असल में किस चीज़ के पैसे दे रहा है
- स्टेप 1: पूरी साइट क्रॉल करें
- स्टेप 2: देखिए Google ने असल में क्या इंडेक्स किया है
- स्टेप 3: Core Web Vitals भारतीय मोबाइल नेटवर्क पर नापिए
- स्टेप 4: ऑन-पेज की बुनियादी चीज़ें, पेज दर पेज
- स्टेप 5: इंटरनल लिंक
- स्टेप 6: हिंदी और अंग्रेज़ी पेजों के लिए hreflang
- स्टेप 7: होस्टिंग और CDN की असलियत
- कौन से टूल सच में चाहिए, और ख़र्च कितना
- ऑडिट पेश कैसे करें कि अगला काम भी मिले
- अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
Upwork और Fiverr पर, या करोल बाग़ की दुकान के मालिक को SEO बेचते वक़्त, पहली फ़रमाइश लगभग हमेशा “ऑडिट” की होती है। बेचने में यह सबसे सस्ती चीज़ है और ख़राब तरीक़े से डिलीवर करने में सबसे आसान। किसी स्कैनर से निकाली हुई चालीस पन्नों की PDF क्लाइंट को उसके बिज़नेस के बारे में कुछ नहीं बताती, और दूसरा कॉन्ट्रैक्ट तो बिल्कुल नहीं दिलाती।
नीचे वही तरीक़ा है जो हम खुद किसी भारतीय क्लाइंट के लिए इस्तेमाल करते: सात चेक, इसी क्रम में, हर एक के साथ एक टूल, एक पास/फ़ेल लाइन, और एक वाक्य जो सीधे रिपोर्ट में जा सके। हज़ार पेज से छोटी साइट पर इसमें एक कामकाजी दिन लगता है। ज़्यादातर काम उन टूल पर चल जाता है जो आपके पास पहले से हैं; जहाँ कोई पेड टूल सच में फ़र्क़ डालता है, वहाँ हम बता देंगे कि वह किस प्लान में है और कब उसे ख़रीदना बेकार है।
क्लाइंट असल में किस चीज़ के पैसे दे रहा है
सूरत में साड़ी का शोरूम चलाने वाले को इससे कोई मतलब नहीं कि उसकी साइट के 312 पेज पर meta description नहीं है। उसे यह जानना है कि रिंग रोड वाला कॉम्पिटीटर “saree wholesale surat” पर उससे ऊपर क्यों आता है, और उसे ठीक करने में कितना ख़र्च आएगा।
इसलिए ऑडिट के तीन हिस्से होते हैं, और क्रॉल उनमें सिर्फ़ पहला है। पहला, findings: तकनीकी तौर पर क्या टूटा हुआ है, सबूत के साथ। दूसरा, priorities: इन सबमें कौन सी पाँच चीज़ें मायने रखती हैं, किस क्रम में, और बाक़ी चालीस क्यों इंतज़ार कर सकती हैं। तीसरा, दाम लिखा हुआ प्लान: अगले महीने आप क्या करेंगे और उसके कितने पैसे लेंगे।
नीचे की हर चीज़ पहले हिस्से में जाती है। पैसा दूसरे और तीसरे हिस्से में है, और उन पर हम आख़िर में लौटेंगे।
स्टेप 1: पूरी साइट क्रॉल करें
क्रॉलर वही करता है जो Googlebot करता है: हर पेज पर जाता है और जो मिला उसकी लिस्ट बनाता है, यानी status code, redirect, title, heading, canonical, इमेज का साइज़ और पेज की डेप्थ। यह सबसे पहले कीजिए, क्योंकि आगे का हर स्टेप तब आसान हो जाता है जब हर URL आपकी स्प्रेडशीट में पहले से मौजूद हो।
Screaming Frog SEO Spider डेस्कटॉप क्रॉलर का स्टैंडर्ड है। इसके प्राइसिंग पेज (screamingfrog.co.uk/seo-spider/pricing/, 21 सितंबर 2026 को देखा गया) पर दो वर्ज़न हैं:
| बिना लाइसेंस | लाइसेंस के साथ | |
|---|---|---|
| क्रॉल की सीमा | 500 URL | कोई तय सीमा नहीं (वेंडर का नोट: आपकी मशीन की मेमोरी जितनी) |
| क्रॉल सेव करके दोबारा खोलना | नहीं | हाँ |
| JavaScript रेंडरिंग | नहीं | हाँ |
| शेड्यूलिंग | नहीं | हाँ |
| Search Console, Analytics और PageSpeed Insights इंटीग्रेशन | नहीं | हाँ |
| कस्टम एक्सट्रैक्शन और कस्टम सर्च | नहीं | हाँ |
| क्रॉल कम्पेरिज़न (पहले और बाद में) | नहीं | हाँ |
| कीमत | कुछ नहीं | वेंडर के पेज पर £199 प्रति लाइसेंस प्रति साल, 21 सितंबर 2026 को देखा गया (यूरो में खुलने पर वही पेज €245 दिखा रहा था) |
किसी छोटे भारतीय बिज़नेस की साइट के लिए 500 URL अक्सर काफ़ी होते हैं। शोरूम, क्लिनिक, कोचिंग इंस्टिट्यूट, CA ऑफ़िस या स्कूल की साइट इतने पेज तक पहुँचती ही नहीं। दिक़्क़त उस दिन शुरू होती है जिस दिन आप 3,000 प्रोडक्ट पेज वाले Meesho या Flipkart सेलर, किसी प्रॉपर्टी पोर्टल या न्यूज़ साइट का काम लेते हैं। वहाँ क्रॉल 500 पर चुपचाप रुक जाता है, यानी आपकी रिपोर्ट ग़लत है और आपको पता भी नहीं चलता।
सीमा से टकराने से पहले जिन दो चीज़ों की कमी खलेगी, वे हैं क्रॉल सेव करना (पिछले महीने वाला क्रॉल दोबारा खोलकर तुलना नहीं कर पाएँगे) और JavaScript रेंडरिंग। भारत में बहुत सी बिज़नेस साइटें WordPress पर हैं और बिना रेंडरिंग के ठीक क्रॉल हो जाती हैं, लेकिन React या Vue फ़्रंटएंड, या ऐप्स से भरी हुई Shopify थीम, आपको ख़ाली पेज दिखाएगी जब तक रेंडरिंग चालू न हो।
हमारे यहाँ Screaming Frog अकेले ₹1,499/महीना पड़ता है, और यह सिर्फ़ Ultimate प्लान में है, Advanced में नहीं। यह ब्राउज़र वाला लॉगिन नहीं बल्कि आपकी मशीन पर चलने वाला प्रोग्राम है, इसलिए ख़रीदने से पहले टूल पेज पर पढ़ लीजिए कि एक्सेस किस तरह दिया जाता है। और अगर महीने में एक छोटी साइट का ऑडिट करते हैं, तो बिना लाइसेंस वाला वर्ज़न ही सही है; उस हालत में न हमें पैसे दीजिए, न वेंडर को।
क्रॉल से जो निकालना है, इसी क्रम में:
- हर non-200 status code। इंटरनल लिंक से आने वाले 404, एक से ज़्यादा हॉप वाली 301 चेन, और 5xx (सस्ती शेयर्ड होस्टिंग पर शाम के पीक आवर में आम बात है)।
- डुप्लिकेट title और 30 अक्षर से छोटे title। जिस साइट को 2019 में किसी रिश्तेदार ने बना दिया था, उस पर “Home” और “Products” ही title होते हैं।
- वे पेज जो होम पेज से चार क्लिक से ज़्यादा दूर हैं। क्रॉलर डेप्थ दिखाता है, और इतने गहरे पेज Google के लिए व्यावहारिक रूप से अदृश्य हैं।
- ऐसे canonical टैग जो कहीं और इशारा कर रहे हों, ख़ासकर http बनाम https और www बनाम non-www की गड़बड़। भारतीय होस्ट अक्सर दोनों वर्ज़न लाइव छोड़ देते हैं।
- 300 KB से बड़ी इमेज। इन पर स्पीड वाले स्टेप में लौटेंगे।
स्टेप 2: देखिए Google ने असल में क्या इंडेक्स किया है
क्रॉल बताता है कि साइट पर क्या मौजूद है। Search Console बताता है कि Google ने उसमें से क्या रखने लायक़ समझा, और इन दोनों का अंतर आम तौर पर पूरे ऑडिट की सबसे क़ीमती फ़ाइंडिंग होती है।
क्लाइंट से उसकी Search Console प्रॉपर्टी का owner एक्सेस माँगिए। अगर प्रॉपर्टी है ही नहीं, तो पहले घंटे में बना दीजिए; DNS रिकॉर्ड या HTML टैग से वेरिफ़िकेशन कुछ मिनट का काम है, और डेटा जमा होना आज से शुरू हो जाएगा, भले ऑडिट एक बार का ही क्यों न हो।
फिर Pages रिपोर्ट में:
- इंडेक्स हुए पेज बनाम क्रॉल में मिले पेज। क्रॉल में 800 पेज मिले और Google ने 140 इंडेक्स किए हैं, तो बाक़ी को कोई चीज़ रोक रही है।
- “Crawled, currently not indexed”। Google ने पेज देखा और रखने लायक़ नहीं समझा। भारतीय ई-कॉमर्स साइटों पर यह लगभग हमेशा पतले प्रोडक्ट पेज होते हैं, जिन पर सप्लायर का एक लाइन का डिस्क्रिप्शन है और कुछ नहीं।
- “Discovered, currently not indexed”। URL Google को पता है और उसने जाने की ज़हमत नहीं उठाई। बड़ी साइटों पर यह आम तौर पर क्रॉल बजट या होस्टिंग की सुस्ती का इशारा है।
- “Duplicate without user-selected canonical”। फ़िल्टर और सॉर्ट पैरामीटर,
?add-to-cart=वाले URL, और स्टेप 1 वाली http/https जोड़ी।
जिन पाँच पेज की क्लाइंट को सबसे ज़्यादा परवाह है (होम, सबसे बड़ी कैटेगरी, सबसे बिकने वाला प्रोडक्ट, कॉन्टैक्ट, और वह पेज जिसे वह रैंक होते देखना चाहता है) उन पर URL Inspection चलाइए। किसी कमाऊ पेज पर “URL is not on Google” आया, तो वह रिपोर्ट के पहले पन्ने की चीज़ है।
क्लाइंट ने जो sitemap सबमिट किया है, उसे भी खोलिए। हैरानी की हद तक कई साइटें 2022 में बना हुआ sitemap सबमिट किए बैठी हैं, जिसमें डिलीट हो चुके पेज हैं और उसके बाद का एक भी नया पेज नहीं।
Search Console में डेटा जमा होने का इंतज़ार किए बिना इंडेक्सिंग पर दूसरी राय चाहिए, तो Semrush का Site Audit साइट को अपने सर्वर से क्रॉल करता है और सर्च में जो मिलता है उससे मिलान कर देता है। हमारे यहाँ यह ₹199/महीना है और हमारे बेचे जाने वाले हर प्लान में है, Advanced समेत।
स्टेप 3: Core Web Vitals भारतीय मोबाइल नेटवर्क पर नापिए
यही वह स्टेप है जहाँ बेंगलुरु के ऑफ़िस में फ़ाइबर पर किया गया ऑडिट लंदन में किए गए ऑडिट से अलग निकलता है, और जहाँ आप क्लाइंट को वह बात बता सकते हैं जो कोई स्कैनर नहीं बताएगा।
Google की तय सीमाएँ (web.dev पर छपी हुई) ये हैं: Largest Contentful Paint 2.5 सेकंड से कम, Interaction to Next Paint 200 मिलीसेकंड से कम, और Cumulative Layout Shift 0.1 से कम, असली विज़िट के 75वें परसेंटाइल पर। “असली विज़िट” वाला हिस्सा मायने रखता है। आपके क्लाइंट के विज़िटर Jio, Airtel, Vi और कहीं-कहीं BSNL पर हैं, अक्सर ऐसे 4G पर जो शाम सात बजे भीड़ भरे बाज़ार में 3G जैसा बर्ताव करता है, और ज़्यादातर दस-बारह हज़ार रुपये वाले Android फ़ोन पर, जिनमें 3 या 4 GB RAM है।
दो सोर्स हैं, और दोनों चाहिए:
- फ़ील्ड डेटा। PageSpeed Insights उस URL और पूरे ओरिजिन के लिए Chrome User Experience Report दिखाता है, बशर्ते ट्रैफ़िक इतना हो कि डेटा बन सके। Google असल में यही आँकड़ा इस्तेमाल करता है। छोटी भारतीय बिज़नेस साइट पर अक्सर फ़ील्ड डेटा होता ही नहीं, और यह अपने आप में एक फ़ाइंडिंग है: नापने लायक़ Chrome विज़िटर ही नहीं हैं।
- लैब डेटा। Lighthouse, चाहे PageSpeed Insights से चलाइए या Chrome DevTools से throttling को “Slow 4G” पर रखकर। ऑफ़िस के कनेक्शन पर बिना throttling के चलाकर हरा स्कोर रिपोर्ट मत कीजिए। वह नंबर आपके कनेक्शन का ब्यौरा है, ग्राहक का नहीं।
लोकल साइटों पर जो वजहें सबसे ज़्यादा मिलती हैं, इसी क्रम में:
- होम पेज पर हीरो स्लाइडर, जिसमें फ़ोटोग्राफ़र से सीधे आई चार 2 MB की JPEG लगी हैं।
- WordPress थीम जो एक अक्षर दिखाने से पहले Elementor, तीन स्लाइडर प्लगइन और Google Fonts से दो फ़ॉन्ट लोड करती है।
- WhatsApp चैट बटन, Facebook Pixel, Google Tag Manager और Tawk.to का बबल, चारों head में।
- शेयर्ड होस्टिंग जिसका time to first byte एक सेकंड से ऊपर है, जिसे किसी भी फ़्रंटएंड फ़िक्स से नहीं बचाया जा सकता।
होम पेज और सबसे बड़े लैंडिंग पेज का LCP, Slow 4G पर, तारीख़ के साथ रिपोर्ट में लिखिए। फ़िक्स के बाद दोबारा नापिए, और आपके पास पहले-बाद की वह तुलना होगी जिसे क्लाइंट अपने ही फ़ोन पर देख सकता है।
स्टेप 4: ऑन-पेज की बुनियादी चीज़ें, पेज दर पेज
क्रॉल का एक्सपोर्ट आपके पास है, इसलिए यह ज़्यादातर स्प्रेडशीट सॉर्ट करने का काम है। जिस भी पेज को रैंक करना है, उस पर देखिए:
- Title टैग: अलग, क़रीब 60 अक्षर के अंदर, जिसमें क्वेरी हो और लोकल बिज़नेस है तो शहर भी। “Dental clinic in Kandivali West | Dr Sharma” का मुक़ाबला “Home” से नहीं है।
- Meta description: मौजूद हो और पूरे वाक्य में लिखी हो। Google ज़्यादातर को ख़ुद बदल देता है, फिर भी उसका न होना बताता है कि साइट पर किसी ने ध्यान नहीं दिया।
- एक H1, जो title के इरादे से मेल खाए। कई लोकल थीम हर पेज पर लोगो को ही H1 में लपेट देती हैं।
- क्वेरी की भाषा। भारत में बहुत सी सर्च रोमन में टाइप की हुई हिंदी है: “sasta gaming laptop delhi”, “sofa set price jaipur”, “kirane ki dukan billing software”. Search Console की Performance रिपोर्ट खोलिए, जिन पेज को पहले से impression मिल रहे हैं उन पर क्वेरी फ़िल्टर कीजिए, और असली स्पेलिंग सामने आ जाएगी। लिखना उसी के हिसाब से है, उस अंग्रेज़ी में नहीं जो कोई एजेंसी पिच डेक में इस्तेमाल करती है।
- पतले पेज। 150 शब्द से कम का कोई भी पेज जिससे रैंकिंग की उम्मीद है। मैन्युफ़ैक्चरर की स्पेक शीट चिपकाकर बनाए गए प्रोडक्ट पेज इसकी सबसे आम मिसाल हैं।
क्लाइंट को जल्दी कोई ऐसा स्कोर दिखाना हो जो उसे समझ आ जाए, तो Woorank डोमेन स्कैन करके ग्रेड वाली रिपोर्ट देता है, जिसमें हर चीज़ की सीधी-सादी व्याख्या साथ होती है। यह क्रॉल का विकल्प नहीं है, और कुछ बातें वही दोहराता है जो Lighthouse बता चुका होता है, लेकिन उसका एक्सपोर्ट दुकान का मालिक आपके बिना बैठे भी पढ़ लेता है। यह ₹199/महीना है और Advanced प्लान में आता है।
स्टेप 5: इंटरनल लिंक
छोटी साइट पर रैंकिंग का सबसे सस्ता लीवर इंटरनल लिंक हैं, और लगभग हमेशा इन्हें छोड़ दिया जाता है, क्योंकि साइट पेजों के एक सेट की तरह बनी थी और उसके बाद किसी ने छुई नहीं।
क्रॉल एक्सपोर्ट से:
- inlinks के हिसाब से सॉर्ट कीजिए। जिन कमाऊ पेज पर एक या दो ही इंटरनल लिंक हैं (आम तौर पर सिर्फ़ मेन्यू से), वे कम लिंक वाले पेज हैं। ब्लॉग पोस्ट, अगर हैं भी, तो शायद ही उस प्रोडक्ट या सर्विस पेज से जुड़ते हैं जिनके बारे में वे लिखे गए हैं।
- ऑर्फ़न पेज ढूँढिए: जो sitemap या Search Console में हैं, पर क्रॉलर होम पेज से चलकर वहाँ कभी पहुँचा ही नहीं। पुराने Google Ads कैंपेन के लैंडिंग पेज इसका आम उदाहरण हैं।
- एंकर टेक्स्ट देखिए। हर जगह “यहाँ क्लिक करें” और “read more” Google को कुछ नहीं बताता। “जयपुर में मॉड्यूलर किचन की कीमत” वाले ब्लॉग पोस्ट से किचन कैटेगरी को जाने वाले लिंक में यही बात लिखी होनी चाहिए।
- साइट के भीतर redirect चेन पकड़िए। ऐसे इंटरनल लिंक जो एक (या दो) 301 से होकर गुज़रते हैं, सीधी बर्बादी हैं; लिंक को आख़िरी URL पर बदल दीजिए।
पूरे ऑडिट के सबसे आसान quick win इसी स्टेप से निकलते हैं। एक दोपहर में सही पेजों पर जोड़े गए दस इंटरनल लिंक किसी कम मुक़ाबले वाली लोकल क्वेरी पर पेज को पंद्रहवें से आठवें नंबर तक ला सकते हैं, और क्लाइंट का इसमें आपके समय के अलावा कोई ख़र्च नहीं।
स्टेप 6: हिंदी और अंग्रेज़ी पेजों के लिए hreflang
भारत में दो भाषाओं वाली साइटें आम हैं और लगभग हमेशा ग़लत सेट होती हैं। जो पैटर्न हमें दिखते हैं: हेडर में लगा हुआ Google Translate का ड्रॉपडाउन, ट्रांसलेशन प्लगइन से चिपकाया गया हिंदी वर्ज़न, /hi/ फ़ोल्डर जो अंग्रेज़ी साइट की कॉपी है और जिसमें सिर्फ़ मेन्यू हिंदी में है, या दो अलग डोमेन जिनके बीच कोई रिश्ता ही नहीं बताया गया।
क्या-क्या देखना है:
- क्या हिंदी वर्ज़न अलग URL पर है? ऐसा JavaScript टॉगल जो URL बदले बिना उसी पेज पर टेक्स्ट बदल देता है, Google को एक ही पेज, एक ही भाषा में देता है, और हिंदी कॉन्टेंट उसके लिए है ही नहीं।
langएट्रिब्यूट। हिंदी पेज परhtmlएलिमेंट परlang="hi"होना चाहिए। हमने जितनी हिंदी साइटें क्रॉल की हैं, उनमें से आधी पर हर पेज परlang="en"लिखा मिला, क्योंकि थीम ने उसे हार्डकोड कर रखा है। (उर्दू या अरबी के उलट, देवनागरी के लिएdirबदलने की ज़रूरत नहीं होती, इसलिए यहाँ सिर्फ़langकी बात है।)- hreflang की जोड़ियाँ। हर अंग्रेज़ी पेज को अपने हिंदी जुड़वाँ पेज का पता देना चाहिए और हिंदी पेज को अंग्रेज़ी का,
hi-INऔरen-IN(या सादेhiऔरen) के साथ, और ऊपर से एकx-default। सिर्फ़ एक तरफ़ से दिया गया रेफ़रेंस Google के लिए बराबर है न दिए जाने के। Screaming Frog की hreflang रिपोर्ट बिना लाइसेंस वाले वर्ज़न में भी चलती है और एक ही जगह बता देती है कि कहाँ वापसी लिंक ग़ायब है। - दोनों भाषाएँ एक ही पेज पर मत डालिए। ऊपर अंग्रेज़ी, नीचे हिंदी वाला शॉर्टकट आम है और दोनों को कमज़ोर करता है।
- फ़ॉन्ट। देवनागरी के लिए वेब फ़ॉन्ट (आम तौर पर Noto Sans Devanagari) लोड होता है, और conjunct वाले पूरे सेट के साथ यह फ़ाइल हल्की नहीं होती। यह सीधे स्टेप 3 से जुड़ जाता है: Slow 4G पर बिना subset किया फ़ॉन्ट हर हिंदी पेज का LCP सीमा के पार धकेल देता है। Subsetting और
font-display: swapफ़िक्स का हिस्सा हैं।
और एक बात जो क्लाइंट से बहस में काम आती है: “हिंदी में ट्रैफ़िक ज़्यादा है” सुनकर हिंदी वर्ज़न बनाने से पहले Search Console में देख लीजिए कि उसके अपने विज़िटर किस भाषा और किस स्क्रिप्ट में टाइप कर रहे हैं। अगर क्लाइंट के पास सिर्फ़ अंग्रेज़ी साइट है और ग्राहक हिंदीभाषी हैं, तो रिपोर्ट में hreflang लिखने से कुछ नहीं होगा। वहाँ असली फ़ैसला यह है कि हिंदी वर्ज़न बनाने में फ़ायदा है या नहीं, और वह एक अलग प्रपोज़ल है जिसका आप अलग दाम लगा सकते हैं।
स्टेप 7: होस्टिंग और CDN की असलियत
होस्टिंग आप ऑडिट में ठीक नहीं कर सकते, लेकिन उसकी पहचान करनी ज़रूरी है, क्योंकि वह बाक़ी हर चीज़ की हद तय कर देती है।
- सर्वर कहाँ है? traceroute चलाइए या IP की लोकेशन देख लीजिए। कई भारतीय साइटें अमेरिका या जर्मनी की शेयर्ड होस्टिंग पर बैठी हैं, सिर्फ़ इसलिए कि रीसेलर ने वही बेचा था, जबकि उसी होस्ट का मुंबई या चेन्नई रीजन मौजूद था। हर रिक्वेस्ट समुंदर पार जाती है, और शाम की भीड़ में पहले बाइट से पहले ही कई सौ मिलीसेकंड जुड़ जाते हैं।
- Time to first byte। इसे क्रॉल से नापिए (Screaming Frog हर URL का रिस्पॉन्स टाइम रिकॉर्ड करता है) और PageSpeed Insights से भी। होम पेज पर 800 ms से ऊपर का मतलब होस्टिंग है; थीम बदलकर वह ठीक नहीं होगा।
- CDN है या नहीं? रिस्पॉन्स हेडर में
cf-ray,x-cacheया उस जैसा कुछ देखिए। ज़्यादातर लोकल साइटों के लिए Cloudflare का बिना शुल्क वाला टियर व्यावहारिक जवाब है: वह स्टैटिक फ़ाइलें विज़िटर के पास रखता है और सुस्त ओरिजिन को कुछ हद तक ढक देता है। भारत में उसके कौन से points of presence इस वक़्त चालू हैं, यह अंदाज़े से मानने के बजाय Cloudflare के नेटवर्क मैप पर देख लीजिए। - HTTPS। लोकल बिज़नेस साइटों पर यह अब भी सब जगह नहीं है। जिस पेज पर फ़ोन नंबर माँगा जा रहा हो, वहाँ Chrome का
Not secureलेबल रैंकिंग से ज़्यादा कन्वर्ज़न की समस्या है। - अपटाइम। क्लाइंट से पूछिए कि क्या साइट “कभी-कभी खुलती ही नहीं”। जवाब हाँ हो, तो रिपोर्ट लिखने से पहले एक हफ़्ते का मॉनिटरिंग चेक लगा दीजिए। जो साइट रोज़ दो घंटे बंद रहती है, उसकी समस्या meta description से कहीं बड़ी है।
होस्टिंग की फ़ाइंडिंग रिपोर्ट में अलग सेक्शन के तौर पर लिखिए, सुझाव और होस्ट के अपने पेज से लिया हुआ मोटा मासिक ख़र्च रुपये में साथ रखकर। “आपकी होस्टिंग आपके ग्राहक खा रही है” बात क्लाइंट को किसी भी Lighthouse मेट्रिक से बेहतर समझ आती है।
कौन से टूल सच में चाहिए, और ख़र्च कितना
छोटी साइट के लिए यह पूरा ऑडिट Search Console, PageSpeed Insights, Chrome DevTools और Screaming Frog के 500-URL वर्ज़न पर चल जाता है, और इनमें से किसी का कोई ख़र्च नहीं। टूल तब ख़रीदिए जब वे छोटे पड़ने लगें, उससे पहले नहीं।
जिन चार टूल की तरफ़ हम हाथ बढ़ाते, और हमारी कैटलॉग में वे कहाँ हैं:
| टूल | ऑडिट में इसका काम | हमारे यहाँ | प्लान |
|---|---|---|---|
| Screaming Frog | 500 से ज़्यादा URL का क्रॉल, क्रॉल सेव करना, JavaScript रेंडर करना | ₹1,499/महीना | सिर्फ़ Ultimate |
| Semrush | क्लाउड साइट ऑडिट, कीवर्ड डेटा, इंडेक्सिंग पर दूसरी राय | ₹199/महीना | Essential, Boost, Advanced, Ultimate |
| SE Ranking | शेड्यूल किए गए ऑडिट, रैंक ट्रैकिंग, क्लाइंट के लिए व्हाइट-लेबल रिपोर्ट | ₹299/महीना | सिर्फ़ Ultimate |
| Woorank | ग्रेड वाली छोटी रिपोर्ट जो क्लाइंट ख़ुद पढ़ ले | ₹199/महीना | Boost, Advanced, Ultimate |
कुछ भी ख़रीदने से पहले तीन बातें ध्यान में रखिए।
Screaming Frog और SE Ranking सिर्फ़ Ultimate प्लान में हैं। Advanced प्लान ₹1,499/महीना में 25 टूल देता है और उसमें Semrush तथा Woorank हैं, साथ में Ahrefs, Moz Pro, Canva और ChatGPT भी, लेकिन इस लेख के दोनों मुख्य ऑडिट टूल उसमें नहीं हैं। अगर आप यहाँ ख़ास तौर पर Screaming Frog के लिए आए थे, तो Advanced आपके लिए ग़लत प्लान है।
चारों टूल अलग-अलग ख़रीदने पर किसी भी प्लान से सस्ते पड़ते हैं। ऊपर की चार सिंगल कीमतें जोड़िए और Advanced के ₹1,499/महीना या Ultimate के ₹2,499/महीना से तुलना कर लीजिए। अगर आपका काम सिर्फ़ ऑडिट है, तो सिंगल टूल ही लीजिए। 91 टूल वाला Ultimate तभी समझ में आता है जब आप उसमें मौजूद डिज़ाइन, AI और वीडियो टूल भी इस्तेमाल करते हों, जो SEO के साथ कॉन्टेंट और सोशल बेचने वाले फ़्रीलांसर के लिए मुमकिन है (कॉन्टेंट स्टैक की लागत वाली पोस्ट में यही हिसाब लगाया गया है)। क्लाइंट रिपोर्टिंग अकेले के लिए SE Ranking अपने आप में ₹299/महीना के लायक़ है, और उसका ब्यौरा उसी रिव्यू में है।
शेयर्ड एक्सेस की अपनी सीमाएँ हैं। लॉगिन ब्राउज़र में डैशबोर्ड से होता है; API key नहीं मिलतीं, इसलिए जिस भी चीज़ को API चाहिए (जैसे Screaming Frog का PageSpeed Insights इंटीग्रेशन, जिसके लिए आपकी अपनी Google API key लगती है, और वह अलग मामला है) वह पर्सनल लाइसेंस से अलग तरीक़े से चलती है। अकाउंट समय-समय पर रीसेट होते हैं, fair-use की हदें लागू हैं, और जब कई लोग एक साथ क्लाउड टूल से क्रॉल चलाते हैं तो सबके लिए धीमा पड़ जाता है। भारी क्रॉल भारतीय दिन के वक़्त प्लान कीजिए, जब अकाउंट साझा करने वाले दूसरे बाज़ारों में रात होती है। एक बार के ऑडिट के लिए यह सौदा ठीक है। तीस क्लाइंट साइटों पर शेड्यूल्ड ऑडिट चलाने वाली एजेंसी के लिए नहीं; वहाँ वेंडर का लाइसेंस ही लीजिए।
पेमेंट पर: भारत के ख़रीदारों के लिए UPI, कार्ड और USDT तीनों आज चालू हैं। प्राइसिंग पेज पर मार्केट IN करते ही हर प्लान रुपये में दिखता है, और पूरी कैटलॉग भारत वाली गाइड में है।
ऑडिट पेश कैसे करें कि अगला काम भी मिले
क्लाइंट को रिपोर्ट ही याद रहती है। कुछ नियम, जो दिल्ली, पुणे और कोयंबटूर से यह काम करने वाले लोगों के लिए काम कर चुके हैं:
तीस फ़ाइंडिंग से नहीं, तीन से शुरू कीजिए। पहला पन्ना यह हो: सबसे बड़ी समस्या, उसकी क़ीमत क्लाइंट के लिए (ग्राहकों में, रैंकिंग में, और जहाँ अंदाज़ा लगा सकें वहाँ रुपये में), और उसे ठीक करने में क्या लगेगा। पूरी स्प्रेडशीट appendix में चली जाए जिसे कोई नहीं पढ़ता, और यह ठीक है; वह साबित करती है कि काम हुआ है।
क्लाइंट को उसका अपना फ़ोन दिखाइए। मीटिंग में उसकी साइट Slow 4G पर कॉम्पिटीटर की साइट के बग़ल में खोलिए, या बीस सेकंड की स्क्रीन रिकॉर्डिंग भेज दीजिए। नंबर सुनकर किसी को कुछ महसूस नहीं होता; छह सेकंड तक घूमता हुआ लोडर देखकर होता है।
फ़िक्स का दाम लिखिए। हर ऑडिट के आख़िर में एक पन्ने का प्रपोज़ल हो: “महीना एक: होस्टिंग शिफ़्ट और इमेज कम्प्रेशन, ₹X। महीना दो: बारह पेज की ऑन-पेज दोबारा लिखाई, ₹Y।” ऑडिट सस्ती बिक्री है; पैसा इसी प्रपोज़ल से आता है। लोकल क्लाइंट को रुपये में कोटेशन दीजिए और Upwork या Fiverr पर डॉलर में, जहाँ पैसा वैसे भी प्लेटफ़ॉर्म के पास रहता है।
PDF और शेयर की हुई शीट, दोनों भेजिए। Fiverr वाले क्लाइंट को फ़ाइल चाहिए होती है। लोकल क्लाइंट को ऐसी चीज़ चाहिए जिसे वह अपने डेवलपर को WhatsApp पर फ़ॉरवर्ड कर सके, और वह डेवलपर अक्सर कोई रिश्तेदार निकलता है। URL लिस्ट और पास/फ़ेल कॉलम वाली शीट असल में वही इस्तेमाल करेगा।
पहले-बाद की तुलना का इंतज़ाम पहले ही कर लीजिए। क्रॉल सेव कर लीजिए (पेड Screaming Frog से, या SE Ranking के शेड्यूल्ड ऑडिट से, दोनों सिर्फ़ Ultimate में हैं, या फिर सादा एक्सपोर्ट रख लीजिए)। साठ दिन बाद दोबारा चलाकर बिना माँगे तुलना भेज दीजिए। इस धंधे में सबसे आसान अपसेल वही ईमेल है।
नतीजे को बढ़ा-चढ़ाकर मत बेचिए। साइट ख़राब होस्टिंग पर है और उस पर कॉन्टेंट नहीं है, तो साफ़ कह दीजिए कि जब तक ये दो चीज़ें ठीक नहीं होतीं, ऑडिट से रैंकिंग नहीं बदलेगी, और इन दोनों का दाम लगा दीजिए। इस बाज़ार के क्लाइंट “पहले पेज की गारंटी” देने वाली एजेंसियों से पहले ही जल चुके हैं; जो फ़्रीलांसर कहता है कि “तीन महीने लगेंगे और वजह यह है”, रेफ़रल उसी को मिलता है।
यही सात स्टेप हर क्लाइंट पर दोहराइए और ऑडिट एक टेम्प्लेट बन जाता है। दूसरे क्लाइंट पर आधा वक़्त लगता है, और पाँचवें पर एक सुबह।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
भारतीय क्लाइंट की साइट के लिए Screaming Frog का 500-URL वर्ज़न काफ़ी है?
क्लिनिक, शोरूम, स्कूल, कोचिंग सेंटर, रेस्टोरेंट या सर्विस बिज़नेस के लिए आम तौर पर हाँ; ऐसी साइटें शायद ही 200 पेज पार करती हैं। ऑनलाइन स्टोर, प्रॉपर्टी पोर्टल, न्यूज़ साइट, या फ़िल्टर और pagination वाली किसी भी साइट के लिए नहीं, और क्रॉल 500 पर बिना चेतावनी रुक जाएगा। तय करने से पहले Search Console में पेज की गिनती देख लीजिए।
Screaming Frog और SE Ranking किस प्लान में हैं?
सिर्फ़ Ultimate प्लान में। Advanced में इनमें से कोई नहीं है। अगर आपको सिर्फ़ यही दो चाहिए, तो इन्हें सिंगल टूल के तौर पर ₹1,499/महीना और ₹299/महीना पर लेना किसी भी प्लान से सस्ता है, और पूरा हिसाब प्राइसिंग पेज पर दिख जाएगा।
टेक्निकल ऑडिट के लिए Semrush या Ahrefs ज़रूरी है?
नहीं। टेक्निकल ऑडिट एक क्रॉलर, Search Console और PageSpeed Insights पर चल जाता है। Semrush की ज़रूरत तब पड़ती है जब आप “क्या टूटा है” से आगे बढ़कर “इस साइट को किन चीज़ों पर रैंक करना चाहिए” पर आते हैं, यानी प्रपोज़ल वाले चरण में। वह हमारे हर प्लान में है, Essential समेत, इसलिए उस चरण पर कीवर्ड डेटा जोड़ने का सबसे सस्ता रास्ता यही है।
Core Web Vitals को भारतीय यूज़र के अनुभव की तरह कैसे नापें?
पहले PageSpeed Insights में असली Chrome यूज़र का फ़ील्ड डेटा देखिए; साइट इतनी छोटी है कि डेटा है ही नहीं, तो Chrome DevTools में Lighthouse चलाइए, network throttling को Slow 4G और CPU throttling को 4x पर रखकर, और वही रिपोर्ट कीजिए। ऑफ़िस के कनेक्शन पर बिना throttling वाला रन कभी रिपोर्ट मत कीजिए।
हिंदी और अंग्रेज़ी साइट के लिए hreflang कैसे लगाएँ?
हर भाषा के लिए अलग URL, हिंदी पेजों पर lang="hi", और हर पेज पर दोनों वर्ज़न की तरफ़ इशारा करते hreflang टैग, साथ में एक x-default। दोनों दिशाओं में टैग होना ज़रूरी है, वरना Google जोड़ी को नज़रअंदाज़ कर देता है। Screaming Frog की hreflang रिपोर्ट, जो बिना लाइसेंस वाले वर्ज़न में भी है, बता देती है कि वापसी लिंक कहाँ छूटे हैं।
BundledSEO का पेमेंट UPI से हो जाएगा?
हाँ। भारत के ख़रीदारों के लिए UPI, कार्ड और USDT तीनों चालू हैं, और प्लान की कीमत रुपये में दिखती है जब आप मार्केट IN चुनते हैं।
भारत में SEO ऑडिट का दाम कितना होना चाहिए?
फ़्रीलांसर की फ़ीस हम तय नहीं करते, और रेंज बहुत चौड़ी है: टेम्प्लेट रिपोर्ट लोकल ग्रुप में कुछ हज़ार रुपये में बिक जाती है, जबकि दाम लिखे प्रपोज़ल के साथ पूरा सात-स्टेप ऑडिट उस बिज़नेस को कहीं ज़्यादा में बिकता है जिसकी कमाई दाँव पर है। ऑडिट सस्ता रखिए अगर उससे मासिक रिटेनर बनता है, और पूरा दाम लीजिए अगर उस क्लाइंट के साथ यही इकलौता काम है।
Screaming Frog जैसे डेस्कटॉप टूल पर शेयर्ड एक्सेस चलता है?
उसका तरीक़ा क्लाउड टूल से अलग है, क्योंकि प्रोग्राम ब्राउज़र टैब में नहीं, आपकी अपनी मशीन पर चलता है। ख़रीदने से पहले टूल पेज पर पढ़ लीजिए कि एक्सेस किस तरह मिलता है, और यह याद रखिए कि जिस भी इंटीग्रेशन को आपकी अपनी Google API key चाहिए (PageSpeed Insights, Search Console), वह आपकी तरफ़ से सेट होता है, चाहे लाइसेंस कहीं से भी आया हो।